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60% सूखा रबड् के अमावा 40% अन्य पदारधों को रबड् मानकर निर्यात करते हैं। किसानों से कम भाव में खरीदकर ऐसे दाम रबड् बोर्ड की सैट पर हर रोज प्रसारित भी करते हैं। मासिक औसत प्रसारित करते वक्त ऊँचे दाम हो जाता हैं। असलियत यह हैं कि किसानों से 100% सूखे रबड् की दाम देकर संभालकर 60% सूखे रबड् और 40% अन्य पदार्ध शामिल करके बहूत सारे 60% drc latex के नाम बेचकर किसे बेवकूफ बना रहे हैं?
नवंबर सन. 2010 के मासिक औसत भाव 60% drc latex को 12922 रुपये ऐर कुलालंपूर में 12302 रुपये प्रति क्विन्टल थे। रबर बोर्ड की नवंबर महीने की प्रसारित 60% को 100% बनाकर बेचने की तरीका नजर आयेगा नीचे जुडे चित्र देखने से।‘Make rubber latex export regular’
Kottayam, March 17: Latex producers should make long-term arrangements to export their produce on a regular and steady basis, said Ms Sheela Thomas, Chairman, Rubber Board while speaking at a meeting of the latex producers convened by the Board. The meeting observed that the prevailing market situation is favourable for exports especially with the international latex price ruling above domestic prices. Participants also felt that it would be advantageous for Rubber Producers’ Societies, which market their produce as latex, to divert to sheet making considering the price differential.The President, Latex Producers’ Association, representatives of the Plantation Corporation of Kerala; State Farming Corporation; Rehabilitation Plantations; Harrisons Malayalam Ltd, and Periyar Latex Ltd participated in the meeting. — Aravindan
(This article was published in the Business Line print edition dated March 18, 2011)
Check the average monthly price of 60% drc latex at Kottayam and Kuala Lumpur Markets. And see the daily price of 60% drc latex here for the month of November 2010.
This is an evidence of export including 40% of content which is not rubber is included as rubber in total quantity exported. The Total export in drc only for a show.
The exported quantity was published for the year 2006-07 as 56545 Tonnes.
To verify the daily prices click on the following dates.
November 2010 SUN MON TUE WED THU FRI SAT 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 - No Comments
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अब मलयालम ब्लोग में ताजा समाचार यह हैं। जोर्ज जोसफ नाम के (एक रिटयेर्ड हेडमास्टर) नकली ब्लोगर प्रोफैल बनाकर पहले के जमाने में नायर जात के सारे औरतें वेश्याये (रण्डी)थी करके स्थापित करनेकेलिये कई पोस्ट लिखी। इसके खिलाफ नायर सर्वीस सोसैटी के सेक्रटरी ने डी.जी.पी को एक खत दिया। उसके परिणाम सैबर सेल ने गूगिल से कम्पूटर के ऐ.पी नंपर प्राप्त करके अड्वकेट षैन को गिरफतार की और उससे पहले ही उसने हैकोर्ट से जमानत ली थी। कुच्छ महीने पहले सन्तोष नाम के एक ब्लोगर ने सेबर सेल से य़ह पूछा था “किसी ब्लोगर नफ्रत की बात (hate speech)” प्रसारित किया है करके नजर में आया कि नहीं। यह बात किसी समाचार पत्र में नहीं आया था। लेकिन कुच्छ दिनों बाद साथ के ब्लोगरों ने उस चित्रकार (Artist) के सही नाम मुरली थे, उनके गिरफतारी के बारे में पोस्ट लिखी और कुच्छ समाचार पत्रों में भी छापा। उस कारण अन्य ब्लोगरों को भी मालूम पडा। उस समय कुच्छ महीने केलिये चित्रकार के ब्लोग आमन्त्रित व्यक्तियों केलिये खुला था। ऐसे ही अब अड्वकेट षैन का भी ब्लोग आमन्त्रित व्यक्तियों केलिये खुला हैं। कुच्छ महीने बाद चित्रकार के ब्लोग के ऊपर और नीचे उशका खूद का लिखी सूचना प्रसारित करके कुच्छ गंदे पोस्टों को निकालकर अधिक शक्ती के साथ नायर जाती और ब्राह्मिण के बारे में नफ्रत की बातें प्रसारित कर रहे हैं। अब यही चित्रकार गिरफतार किया हुआ षैन के मदद की पोस्ट प्रसारित कर रहे हैं।नायर समुदाय के सारे स्त्रीयें वेश्यायें करके स्थापित करने केलिये छापे किताबें (हमें मालूम हैं कितने साल हुये छापना शुरू हुआ करके) और इन्टेर नेट से सेर्च करके (वह शुरू होकर कुच्छ साल ही हुआ हैं) सपूत शामिल कर रहे हैं जो गलत हैं। तीस या चलीस उम्र के लोग ऐसे पुराने जमाने के चरित्र प्रसारित कर रहे हैं जो आँखें देखे जैसे। सैबर आक्ट 2008 के बदलाव के चर्चा के समय हमारे पारलमेन्ट में विरोधि दल हंगामा मचा रहे थे। उसी वजह से नये बदलाव किसी चर्चा के बगैर ही काम में लाया गया।
ज्योर्ज जोसफ जो एक रिटयेर्ड अध्यापक नाम कृस्टियन नाम हैं उस नाम को अन्य समुदाय के व्यक्ति ओक वकील इस्टेमाल करने पर जरूर आश्चर्य होता हैं। अब विचित्रकेरलम ब्लोग देखने पर ऐसे नजर आयेगा।
यह ब्लॉग मात्र आमंत्रित पाठकों के लिए है
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ज्योर्ज जोसफ बदलकर शंखघवरयन और उसके बाद जी.जे बनकर गलती से मुक्त होने का प्रयास हो रहा हैं। कुच्छ दिनों बार फिर से यह ब्लोग प्रसारित होने का उमीद हैं। आज तक हम ऐसे ही देखा हैं। अभी भी कुच्छ पोस्ट गूगिल संभाल कर रखा हुआ देख सकते हैं। सेभालकर रखाहुआ ब्लोग और कुच्छ दिनों देख पायेगा।
सेवा की शर्तें | गोपनीयता | सामग्री नीति हर ब्लोगर पढना चाहिये।
दूसरों की पहचान धारण करना: कृपया कोई अन्य व्यक्ति या किसी संगठन का प्रतिनिधि बनकर, जो कि आप नहीं हैं, अपने पाठकों को न भटकाएं या उन्हें भ्रमित न करें. हम यह नहीं कर रहे कि आप पैरोडी या व्यंग्य प्रकाशित नहीं कर सकते – बस ऐसी सामग्री से बचें जो संभवत: आपके पाठकों को आपकी वास्तविक पहचान की ग़लत जानकारी दे.
ऐसे ब्लोग का लक्ष्य वर्गीयता के बढावा देना और आपस में लडने को तैय्यार करना ही हैं। एन.एस.एस के जनरल सेक्रटरी के शिकायत के कारण कारवाई हुआ और गिरफ्तारी होकर जो व्यक्ती एन.एस.एस से दूर चले गये व्यक्तियों को फिरसे शामिल कराकर संघटन के ताकत बडेगा। ऐसे होने पर अन्य जातियों का भी ताकत बडेगा। सारे राष्ट्रीय पारटियों के लक्ष्य भी वही हैं। आनेवाली पंचायती चुनाव में भायदा उढाने की एक पहली कदम होगा यह कारवाई।
ऐसे अवस्था में तैय्यारी क्यों करना पडा जरा सोचने की बात हैं। श्री मनमोहन सिंह के इरादे की कारण शशी थरूर तिरुवनन्तपुरम लोकसभा चुनाव में एक लाख तक वोटें ज्यादा पाकर सबको हराण करदी थी। इतना ज्यादा मत वर्गीयता और पार्टी के अतीत सोचने वाले जनता के निर्णय का परिणाम हैं। कोणग्रस और अन्य पार्टी के लोगों को यह वात हजम होनेवाला नहीं था। उसका सपूत हम कई बार देख चुके हैं। थरूर नायर नहीं हैं करके एन.एस.एस के जनरल सेक्रटरी नारायण पणिक्कर बोलने का कोई असर मत में दिखाई नहीं दी।
कई सालों से सैबर सेल में सिन्धू जोय (सी.पी.एम), पिणराई (सी.पी.एम) और नारायण पणिक्कर के शिकायत के सिवा और क्या असर हम को दिखाई दी? इसका जवाब दस रुपये का कोर्ट फी स्टांप छिपाकर सैबर सेल के पब्लिक इनफरमेषन ओफीसर को समर्पित करके यह बात के पता करना चाहिये।
घृणा फैलाने वाले वक्तव्य: हम ब्लॉगर का उपयोग आपके विचारों की अभिव्यक्ति के लिए करना चाहते हैं, भले ही वह अत्यधिक विवादास्पद क्यों न हो. परंतु, घृणा फैलाने वाले वक्तव्य प्रकाशित करके इस सीमा को पार न करें. इससे हमारा तात्पर्य ऐसी सामग्री से है जो वंश, नस्ल, धर्म, अक्षमता, लिंग, आयु, वरिष्ठता की स्थिति या यौन रुझान/लैंगिक पहचान के आधार पर घृणा या हिंसा फैलाती है. उदाहरण के लिए, ब्लॉग में ऐसा न लिखें कि X नस्ल वाले लोग अपराधी हैं या वे Y धर्म का पालन करने वालों के प्रति हिंसा का समर्थन करते हैं.
गूगिल और ब्लोगर के बीच कुच्छ भी छुपा नहीं हैं। लेकिन अंजान ब्लोगर को पकडने केलिये भारत सरक्कार तथा राज्य सरकार को गूगिल के सहारा लेना पडता हैं। ऐसे अवस्था में गूगिल के नियमो के पालन कैसे होगा
सही उपयोग. आप यह स्वीकार करते हैं कि इस सेवा का अपने लिए उपयोग करने, आपके किसी भी संदेश, और उनके परिणामों के लिए आप स्वयं ज़िम्मेदार हैं. आप यह स्वीकार करते हैं कि आप इस सेवा का उपयोग आपके देश से निर्यातित तकनीकी डेटा के प्रेषण संबंधी किसी भी कानून और अमेरिकी निर्यात नियंत्रण कानूनों समेत विद्यमान सभी स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों, नियमों और विनियमनों के अनुसार करेंगे
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सूचना अधिकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियमों को लागु करने में ढिलाई
अरुंधती धुरु और डॉ संदीप पाण्डेय
सूचना का अधिकार अधिनियम और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत जनता जांच के प्रावधान से आम नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है कि वोह सरकार को जवाबदेह ठहरा सके, परन्तु जमीनी स्तर पर यह दोनों ही अधिनियम सही मायनों में लागु नहीं हो पाते हैं.
भारतीय लोकतंत्र में सूचना का अधिकार अधिनियम और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम नि:संदेह एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर रहे हैं. जो कार्यप्रणाली पहले संवेदनहीन थी और जिसमें पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों ही नहीं थे, ऐसी व्यवस्था में इन अधिनियमों से आम आदमी को यह अधिकार प्राप्त हो गया कि वोह इसी व्यवस्था में सरकार को जवाबदेह ठहरा सके और पारदर्शिता सुनिश्चित कर सके. जाहिर बात है कि शासन करने वाले लोग इस जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए आदतन तैयार नहीं थे, परन्तु दोनों अधिनियमों के आ जाने से इन लोगों को कानून का अनुपालन करना पड़ा. इन लोगों को यह समझ में आने लगा कि आखिरकार वोह लोग लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कार्यरत हैं जिसमें आम जनता ही केंद्र में होती है. लोगों ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत हुए कार्य की जानकारी मंगनी शुरू की और जनता जांच के प्रावधान को लागु किया – यह आन्दोलनकारी नीतियाँ हैं क्योंकि अँगरेज़ सरकार से जिस व्यवस्था को हमने अपने हाथों में लिया है और जिस तरह से अफसरवाद की मानसिकता पनपी है, यह दोनों नीतियों को लागु करना कोई मामूली बात नहीं थी.
अब शासन करने वालों को लग रहा है कि बहुत हो चुका! आम लोगों को एक हद तक ही पारदर्शिता और जवाबदेही का लुत्फ़ मिलना चाहिए. आम लोगों को इस हद तक की जवाबदेही और पारदर्शिता नहीं मिलनी चाहिए जिससे कि शासन करने वाले लोगों पर ही सवाल खड़े हो जाएँ. बिना रोक टोक के जो शासन करते आ रहे हैं, उन्हें अब इन जन हितैषी नीतियों से डर नहीं लगता है और अब वोह उन लोगों से, जो इन नीतियों के तहत प्रश्न उठा रहे हैं, बदले की भावना के साथ निबट रहे हैं. इन शासन करने वालों ने यह ठान ली है कि जो भी आवाज़ उनके वर्चस्व पर सवाल खड़ा करेगी, वोह उसको बर्बरता से कुचल देंगे. हालाँकि प्रशासनिक तंत्र को इन नीतियों को लागु करने के लिए बाध्य होना चाहिए, परन्तु वोह इन्ही शासन करने वाले लोगों द्वारा इस्तिमाल किया जा रहा है.
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के कस्य ब्लाक के डुमरी गाँव पंचायत में, जो गरीबी-रेखा-के-नीचे सर्वेक्षण से सम्बंधित जांच शुरू हुई थी, वोह विकास के लिए आई बड़ी धनराशी के गबन की बड़े पयमाने पर जांच बन गई. ग्रामीण विकास विभाग के सहायक ग्रामीण आयुक्त ने गरीबों के लिए घरों के लिए आई धनराशी में और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम की धनराशी में बड़े पयमाने पर गड़बड़ी पायीं. वकील उदयभान यादव, जिन्होंने इन जांचों को कराने में मुख्य भूमिका ली थी, को ग्राम प्रधान दिनेश वर्मा और उसके आदमियों ने धमकाया.
२८ फरवरी २००९ को ग्राम प्रधान के आदमी एक दलित मजदूर परसुराम को मार रहे थे, क्योंकि परसुराम ने जाली मास्टर रोल पर सवाल खड़ा कर दिया था जिसमें उसके नाम से पैसा निकाला गया था जब कि असलियत में उसने एक दिन भी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत कार्य नहीं किया था. उदयभान ने जब परसुराम को पिटते देखा, तो हस्तछेप किया. ग्राम प्रधान के लोगों ने उदयभान को भी बहुत मारा. एक अन्य दलित, कपिल देव, जिसको ग्राम प्रधान का संगरक्षण प्राप्त है, उसने उदयभान के ख़िलाफ़ पुलिस रपट लिखवा दी और दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा करने के लिए केस बन गया. राजनीतिक दबाव की वजह से, ९ मार्च २००९ को, उदयभान और उसके पिताजी हरी यादव को गिरफ्तार कर लिया गया. परसुराम के भाई राम भारत और पिताजी जय कारन को भी गिरफ्तार किया गया पर बाद में रिहा कर दिया गया.
१४ जनवरी २००९ को हरदोई जिले के भरावन ब्लाक के गाँव पंचायत ऐरा काके मऊ में ग्राम प्रधान के घर के बाहर अपनी मजदूरी मांगने के लिए कई मजदूर इकठ्ठे हो रहे थे. ग्राम प्रधान के पति, घनश्याम, जो अपनी बीवी के नाम पर प्रधानी का कार्य सँभालते हैं, ने पहले तो मजदूरों को डरा-धमका कर भगाने की कोशिश की. जब तनाव बढ़ गया तो पुलिस भी आ गई. जब मजदूरों ने, राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत, ग्राम प्रधान की शिकायत दर्ज कराने की बात की, तब घनशयाम ने अपने लोगों से मजदूरों पर लाठियों से हमला करवा दिया. इस घटना के दौरान अतरौली पुलिस स्टेशन के एस.एच.ओ और अन्य पुलिसकर्मी मूक दर्शक बने रहे. एक दलित मजदूर मेडई और अन्य सामाजिक कार्यकर्ता राम भरोसे को सर पर चोट आई. हालाँकि घनश्याम के ख़िलाफ़ पुलिस केस फाइल हो गया था परन्तु बार-बार कहने के बाद भी और अनेकों अधिकारियों को पत्र लिखने के बाद भी, घनश्याम के ख़िलाफ़ दलितों पर हिंसा करने का अधिनियम नहीं लगाया गया है, और अब तक कोई भी प्रशासनिक करवाई नहीं की गई है.
मऊ जिले के कोपागंज ब्लाक के देवकली, बिश्नुपुर, पुराना कोपा और जैराम्गढ़ गाँव के मजदूर, जिसमें से अधिकाँश महिलाएं और दलित थे, पिछले ६ महीने से नहीं मिली हुई मजदूरी को मांगने के लिए ब्लाक अधिकारी के कार्यालय के बहार इकठ्ठा होने लगे. इनमें से एक मजदूर को वार्तालाप के लिए कार्यालय के भीतर बुलवाया गया और अन्दर बैठे हुए लोगों द्वारा बहुत मारा गया. मजदूरों में यह जान कर बहुत रोष था, और इस क्रोध का ब्लाक विकास अधिकारी राम दुलार और एक अन्य कर्मचारी संजीव सिंह को सामना करना पड़ा. इसी घटना में कुछ महिलायों को भी चोट आई. अभी तक न तो किसी भी मजदूर को उसकी मजदूरी मिल पायी है और न ही मजदूरों को मारने वाले लोगों पर कोई भी करवाई हो पायी है.
२८ फरवरी २००९ को सीतापुर जिले के कस्मंदा ब्लाक के गाँव पंचायत रूर में, एक तालाब को गहरा करने का काम चल रहा था. इन्ही लोगों में से कुछ महिलाएं हैण्ड पम्प से पानी पीने चली गई. यह हैण्ड पम्प इस छेत्र के एक बाहुबली मदन दिक्षित का था, जिसको मदन मुनि नाम से जाना जाता है. इन महिलाओं को अश्लील टिप्पणियों को झेलना पड़ा. जब इन महिलाओं के परिवार के पुरुषों ने इस बात का विरोध किया, तो उनकी पिटाई कर दी गई. जब मजदूरों ने पुलिस स्टेशन जा कर रपट लिखानी चाही, तो मदन मुनि पहले से ही वहाँ पर बैठा हुआ था. मजदूर उसके ख़िलाफ़ दलितों पर हिंसा करने के लिए केस लिखवाना चाह रहे थे. पुलिस ने रपट लिखने में आनाकानी करी और अगले दिन सुबह रपट लिखवाने को कहा. जब अगले दिन सुबह भी मजदूर रपट लिखवाने के लिए डटे हुए थे, तो पुलिस स्टेशन के भीतर ही मजदूरों में से दो पुरुषों और दो महिलाओं को पीटा गया. इस छेत्र में सक्रिय सामाजिक संगठनों की मदद से मदन मुनि के ख़िलाफ़ दलितों पर हिंसा करने का केस रपट तो लिखा गया परन्तु उन पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कोई केस नहीं लिखा गया जिन्होंने पुलिस स्टेशन में ही मजदूरों को मारा था.
बनारस जिले के चोलापुर ब्लाक में, लगभग २०० मजदूर जो धौरहरा, सारयां और मुनरी के रहने वाले थे, उनको सारयां जीपी में एक तालाब को गहरा करने के लिए पिछले १ महीने से मजदूरी नहीं मिली थी. जूनियर अभियंता ने भुगतान रुपया ३९.८० प्रति दिन के हिसाब से करने की बात की थी, और मजदूरों का कहना था कि इसी काम के लिए धौरहरा जीपी में न्यूनतम भुगतान रुपया १०० प्रति दिन हुआ है. २६ फरवरी २००९ को गाँव के विकास अधिकारी ने मजदूरों को लिखित आश्वासन दिया कि ३ मार्च २००९ को रुपया १०० प्रति दिन के दर से उनको भुगतान हो जाएगा. जब मजदूर ५ मार्च को ब्लाक विकास अधिकारी के कार्यालय में इकठ्ठे हुए, तो अधिकारी उपस्थित नहीं थे. एक ब्लाक कर्मचारी की सलाह पर उन्होंने वाराणसी-आजमगढ़ राजपथ (हाईवे) बंद कर दिया. चोलापुर पुलिस स्टेशन के एस.एच.ओ वहाँ पर पहुँचे और मजदूरों को बर्बरतापूर्वक लाठियों से मारा गया. लगभग ५० मजदूर, जिनमें १० महिलाएं भी शामिल थीं, बुरी तरह से चोट खाए थे. हीरावती, जो गर्भवती थी, वोह भी चोट खायी थी. २० लोगों को और ५० साइकिलों को पुलिस स्टेशन लाया गया और मजदूरों को निजी ‘बांड’ भरने के बाद ही रिहा किया गया. जब एस.एच.ओ से पुछा गया कि उस गाँव के विकास अधिकारी के ख़िलाफ़ वोह क्या करवाई करेगा जिसने मजदूरों को उनके कानूनन हक़ से वंचित रखा है, चूँकि इन मजदूरों का राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत मजदूरी पर कानूनन हक़ बनता है, तो उसने कहा कि वोह सिर्फ़ ऊपर से आए हुए आदेशों का अनुपालन कर रहा है. उसने उस अधिकारी का नाम लेने से मना कर दिया जिसने लाठीचार्ज के आदेश दिए थे. अगले दिन, रुपया ४२ प्रति दिन के दर से मजदूरी, मजदूरों के अकाउंट में भेज दी गई.
मजदूरों को दबाना अब एक प्रवृति बनती जा रही है. शासन करने वालों ने मजदूरों द्वारा अपने अधिकारों के मांगे जाने पर सख्ती से पेश आने की ठान ली है. मजदूरों को सज़ा मिलेगी, ऐसा माना जाने लगा है. शासन करने वाले यह समझ रहे हैं कि मजदूरों का अधिकार मांगने से, लोकतंत्र में निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी फिर मजदूर वर्ग अपनी भागीदारी मांगेगा और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष भी मजबूत होगा. शासन करने वाले लोग इतनी आसानी से यह शक्ति खोना नहीं चाहते हैं. उपरोक्त किस्सों से यह भी साफ़ झलक रहा है कि मजदूर वर्ग अब अधिक संगठित होता जा रहा है. राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम की यह तो एक उपलब्धि रही है. हमें उम्मीद है कि मजदूरों की समस्याएँ लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अन्दर ही शांतिपूर्वक ढंग से सुलझाई जाएँगी और इससे समाज में और सरकार में लोकतान्त्रिक मूल्यों को बढ़ावा मिलेगा।
इस समाचार यहाँ से मिला। -
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