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एक व्यक्ती या परिवार को अपने अधीन पर रखनेवाला जमीन के विस्तृती के नियम 1970 में केरल में लागू करने के विषय, जो किसान के च्छोटे हिस्सा भूमि अधिग्रहण जरिये सरकारी कार्वाई के विषय, कृषि उत्पादन के भव गिराने के विषय, उर्वरक कीटनाशक घास को खतम करनेवाले रौण्टप वगैरह के विषय, गांव कार्यालय में कर भरते विषय, मदद पाकर आयात निर्यात के विषय जैसे बातों पर किसान को पीडित होना पढते हैं। ट्रेड – यूनियन चलाने वाले सर्कारी कर्मचारियों के नेतृत्व में ही होताहैं। ऐसे संखटन सर्कारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई क्ररवाई आजतक नहीं ली। 25 साल में सर्कारी कर्मचारियों के धनका 20 गुणा बडा और पुरुष श्रम केलिये भी उतना ही बडा। उसके कारण दैनिक आवश्यक वस्तुओं की कीमत के बडना हैं। लेकिन ऐसे बडोत्री आवश्यक वस्तुओं की हुआ ही नहीं। केरल के रहने वालों को आवश्यक वस्तू चावल हैं। वही चावल एक या दो रुपये प्रति किलो मिलता हैं तो कर्मचारियों के धनका कटना चाहिये।
उत्तर प्रदेश में किसान भूख के कारण बीबी को बेचने की समाचार हम समाचार पत्रों में पढा। वही राज्य में कियान के जमीन भूमी अधिग्रहण जरीये कबजे करके किसी पैसेवाले व्यक्ती को ऊँचे दाम में दी और उसके खिलाफ आवाज उठानेवाले कियानों को मार डालने की समाचार भी पढा। क्या आप को कुच्छ भी मेहसूस नहीं होता?
मुंबई में गरीबों के छोपडियों भूमी अधिग्रहण के जरीये जो कबजा करने का कोशिश और उसके खिलाफ के आवाज भी हम ने सुना।
अन्ना हसारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल केलिये लडते हैं वह जो हैं ऊँचे मछलियों को काबू में ला सकते हैं। लेकिन आम जनता को लूटनेवालों को कोन हतकडी लगायेगा? विज्ञापन प्रसारित करनेवाले व्यवसाय,कॉर्पोरेट, भ्रष्टाचारी पार्टी के प्रवरतकों वगैरह को संभालने केलिये यहाँ कई माध्यम मौजूद हैं। ब्लोग और सामाजिक नेटवर्क धोडा कुच्छ परिवर्तन ला सकते हैं। लेकिन वहाँ भी भ्रष्टार करने वालों के चमचे मौजूद होगा। नकली प्रोफ़ाइल बनाकर ङम संघडित शक्ती बोलकर व्यक्तियों को तकलीफ दागा। प्रजातंत्र के नाम से करनेवाला भ्रष्टाचार और गुण्टागर्दी रोकनेमें पुलीस या न्यायालय भी पराजित होता हैं। -
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अन्ना हजारे के आंदोलन ने अचानक युवाओं को जिस तेजी से अपनी ओर खींचा, उससे राजनीतिक दिग्गज भी हैरान रह गए। आज हमारा युवा खुद से बहुत ज्यादा उम्मीद रखता है। वह काफी कुछ पाना चाहता है। कई बार उसे पता नहीं होता कि सही रास्ते कौन-से हैं। यह बताने वाला सही रोल मॉडल भी युवा के पास नहीं है।
अन्ना हजारे के आंदोलन ने युवाओं को आकर्षित किया तो कुछ खास वजहें थीं। अन्ना ने सीधी-साफ और दोटूक चीज की मांग की – जन लोकपाल बिल। उनकी भूख हड़ताल एक रियलिटी ड्रामे की तरह थी। ड्रामा लोगों को खींच रहा था। तीसरी बात यह कि कुछ ऐसी हस्तियां उनके साथ थीं जिनका अपना संगठन है और जिन्हें युवा आइडल मानता हैजैसे किरण बेदी, श्रीश्री रविशंकर, बाबा रामदेव। अन्ना ने सीधे-सीधे अच्छाई और बुराई के बीच लकीर खींच दी। बिना किसी डर या दुर्भावना के उन्होंने इस लकीर की दूसरी तरफ खड़े नेताओं की ओर इशारा किया।
इसने भी आग में घी का काम किया। सबसे अहम बात यह कि भ्रष्टाचार से पूरा देश त्रस्त है, जिससे युवा देश के अन्य लोगों की तरह आंदोलन की तरफ खिंचा चला आया। खुद अन्ना के सीधे-सादे और ईमानदार व्यक्तित्व का भी इसमें योगदान था। वह सत्ताधारियों के साथ नहीं खड़े थे। राजनीतिज्ञों को खदेड़े जाने ने भी बिजली सरीखा असर किया। इससे युवा में यह संदेश गया कि यह बंदा जनता के लिए काम करेगा। इसका निजी कोई स्वार्थ नहीं। कॉमनवेल्थ खेल के वक्त से ही घोटालों का जो सिलसिला शुरू हुआ, तभी से सभी के अंदर एक क्रोध था कि तुमने देश का नाम खराब क्यों किया। घोटालों से राष्ट्रीय स्वाभिमान आहत था। उसका भी प्रभाव दिखा।
आक्रोश था जो प्रेशरकुकर की तरह अन्ना की सीटी बजने के साथ बाहर आ गया। सरकार हफ्ते की देरी करती तो यह बड़ा रूप ले सकता था और खतरनाक हो सकता था। अहम बात यह है कि बीस-पच्चीस साल पहले जन्मे युवा ने इस आंदोलन के जरिये राजनीति का पहला स्वाद चखा है। उसने कम से कम अपनी ताकत को पहचाना है। जरूरत इस बात की है कि वह इस ताकत का सही इस्तेमाल भी जाने।
लोगों को बदलाव चाहिए। खास तौर पर युवाओं को तुरंत बदलाव चाहिए। बदलाव शांति से नहीं आता तो युवाओं का क्रोध हिंसा में बदल जाता है। आंदोलन से युवाओं की सोच में जबरदस्त बदलाव आया है। आज छोटे-छोटे बच्चे अन्ना हजारे को गांधी के रूप में देखते हैं। अन्ना बापू की तरह अड़ियल भी है, नर्म भी, निडर भी।
जन लोकपाल बिल भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अहम बिल है। कई देशों में ऐसी ही निष्पक्ष और ताकतवर संस्था भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सत्ताधीशों की जांच करती है। हांगकांग का उदाहरण सामने है। आजादी का मतलब यह नहीं कि यह सत्ताधीशों की आजादी है। एक बार चुने गए तो आप खुद ही पुलिस स्टेशन हैं और खुद ही कानून हैं। आजादी का यह मतलब नहीं कि सत्ताधारियों पर अंकुश के कानून न बनाए जाएं।
इस आंदोलन से अगर युवाओं और लोगों ने पॉवर का स्वाद चखा है, तो नेताओं ने पॉवर की सीमा का स्वाद चखा है। अगर प्रभावी लोकपाल के गठन में गतिरोध आता है, तो युवा तभी फिर अन्ना के आंदोलन में उतरेंगे जब अन्ना यह बताने में सफल रहें कि क्या गलत हुआ है और कौन लोग असरदार लोकपाल नहीं बनने दे रहे हैं। तब निश्चय ही लोग फिर जुड़ेंगे। हालांकि यह ठीक इसी स्तर पर और इतना ही स्वत:स्फूर्त शायद न हो।
एक बार जो हो जाता है, वह वैसा ही दोबारा घटित नहीं होता। अगले आंदोलन की शक्ल अलग होगी। वैसे सरकार अब ऐसा कुछ नहीं करेगी कि अन्ना को फिर अनशन जैसा निर्णय लेना पड़े, क्यों कि नेताओं में डर पैदा हो गया है कि अगर वे भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़े दिखाई दिए तो उनके नीचे से समर्थन खिसक जाएगा। प्रभावी लोकपाल जनता का हक है, अब जनता को बहलाया-फुसलाया नहीं जा सकता, यह नेता समझ चुके हैं।
इस आंदोलन को राजनीतिज्ञों के ऊपर अंकुश की तरह काम करना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि इसका स्वरूप और शक्ति ऐसी है कि यह एक और राजनीतिक पार्टी बन जाए। यह पार्टियों पर दबाव बनाए रखने का रचनात्मक काम कर सकता है। यदि अच्छा लोकपाल हो और कई भ्रष्ट नेता जेल जाएं, तो भ्रष्टाचार के खत्म होने की संभावना अभी बनी हुई है। यदि हर साल हर पार्टी अपने यहां से दस प्रतिशत सबसे भ्रष्ट नेताओं को निकालती जाए और दस प्रतिशत सही उम्मीदवार चुने, तो संभव है कि अगले दस सालों में पार्टियों का नया रंगरूप हो।
इसके लिए कई अन्य चीजें करने की जरूरत है। मिसाल के लिए, चुनावों के दौरान लीगल एलेकशन फंडिंग का एक तरीका हो, जिससे चुनाव में काले-सफेद धन को लेकर पारदर्शिता आए। जमीनी राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए भी वाजिब सेलेरी या पारिश्रमिक हो, ताकि वह दूसरे गलत फायदों के लिए पार्टियों के साथ न जाए। इन सब चीजों के लिए वातावरण और दबाव बनाने का काम यह आंदोलन करे, न कि खुद एक राजनीतिक पार्टी बने। (जैसा प्रणति तिवारी से कहा)
Courtesy: युवाओं में नई जागरूकता
केरल में भी हम युवाओं के इकटा करके चर्चा जारी रखें और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास करूँगा।कॊल्लम में श्री एस. बलराम ने कहा था कि ह्यूमण रैट आक्ट (Human Right Act) के हेडिंग बदलकर चैलड रैट आक्ट बना दिया हैं। क्या अन्याय है यह?
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Keralafarmer: “Support from Trivandrum to Anna Hazare”
Govt agrees to Anna Hazare’s demands on Lokpal Bill: Reports
Social activist Anna Hazare speaks during the 4th day of his indefinite fast for ‘Jan Lokpal Bill’, in New Delhi on Friday.NEW DELHI: Anna Hazare’s crusade against corruption is believed to have won the battle on Friday with the government relenting to the demands made by the veteran social activist, TV reports said. However, Hazare on Friday night announced that his fast has not ended and further added that he will take a final decision on Saturday. A three member team, Arvind Kejriwal, Kiran Bedi and Swami Agnivesh, had met the government representatives and it is believed that government has relented to Anna Hazare’s demands. According to reports, Pranab Mukherjee is likely to be the chairman and Shanti Bhushan to be the co-chairman of the proposed joint committee to draft an effective Lokpal Bill. The draft of the Lokpal Bill will reportedly be formally notified. Anna Hazare had demanded the appointment of a chairman and a co-chairman for the proposed joint committee to draft the Lokpal Bill and rejected the government’s offer of setting up of the committee by a letter of the law ministry. He also said there should be no “tainted” ministers in the joint committee comprising civil society members and ministers. The government had sent a draft on Friday afternoon, following which Hazare sent his draft. “We replied to it and spoke to the three ministers (Union HRD minister Kapil Sibal, law minister Veerappa Moily and minority affairs minister Salman Khurshid) about it,” Swami Agnivesh, one of Hazare’s three emissaries had said. Earlier on Friday, the three emissaries held talks with the government on the proposed formation of a committee for drafting the Lokpal Bill.जीत हम सबके।
आज श्याम(08-04-2011) को पाँच बजे कई संगटन को लोग तिरुवनन्तपुरम मंत्रालय के सामने इकटा हुये और अन्ना हजारे को पूरा समर्धन दिया। कई प्रमुख व्यक्ती वहाँ आये थे। कई मीडिया चानेल उस धर्णे को अपने क्यामरे में रिकोर्ड की। नीचे शामिल की गई चित्र नोकिया 3110c पर ली गई थी। -
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स्वाभाविक रबड्
साल आरएसएस 4 /प्रतिक्विन्टल दामसूचक
1983 1672 100.00 1984 1689 101.34 1985 1694 101.64 1986 1670 100.20 1987 1766 105.96 1988 1811 108.66 1989 2040 122.40 1990 2117 127.02 1991 2128 127.68 1992 2463 147.78 1993 2546 152.76 1994 3107 186.42 1995 5059 303.54 1996 5122 307.32 1997 3988 239.28 1998 3013 180.78 1999 2997 179.82 2000 3125 187.50 2001 3109 186.54 2002 3621 217.26 2003 4814 288.84 2004 5571 334.26 2005 6068 364.08 2006 8783 526.98 2007 9006 540.36 2008 10775 646.50 2009 9756 585.3 2010 16908 1014.48 एक विश्वविद्यालय के दूसरे दर्जे की कर्मचारी को केरल में सन. 1983 में 675 रुपये बेसिक धनका और 122 रुपये डी.ए मिलाकर 797 रुपये थे। 25 साल के बाद सन. 2008 में बेसिक धनका 7990 रुपये और डी.ए 3036 रुपये मिलाकर 11,026 रुपये बन गये। इसका मतलब धनका 13.83 गुणा बड चुके हैँ। HRA, CCA के सिवाय यह धनका मिलते हैं। 1983 में केती पर काम करनेवाला मजदूर को 20 एक दिन मिलते थे। सन. 2008 में 17.5 गुणा बडकर 350 रुपये होगया हैं।.
किसानों को न्याय मिलने केलिये रबड् की दाम सन. 2008 -में 231.24 रुपये प्रतिकिलो मिलना चाहिये था। (16.72 x 13.83) या वह कर्मचारी को धनका 5157 रुपये (797 x 6.47) ही होना चाहिये।
Price Indices of major agricultural commodities with base year 1983 in Kerala
The land value increased in 25 years is 75 times in my area.
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