केरलाफार्मरऑनलाइन.कॉम विविध भाषाई ब्लोग किसानों केलिये एक किसान प्रसारित कर रहा हूँ
  • यह तुम्बूरमूऴि एयरोबिक कम्पोस्ट की कारखाना हैं। ऐसे एक कारखाना बनाने केलिये 60 सिमेंट ईंट जरूरी हैं। अन्तर की लंबाई, चैडाई और ऊँंचाई 4 फीट की होगा। सबसे नीचे 6 इंच ऊँचाई में गोबर या गाढा बयोग्यास स्लरी भरना हैं। उसके ऊपर कुच्छ सूखे पत्ते बिझाना जरूरी हैं। पत्तों के ऊपर किसी भी जैव अपशिष्ट (मांस, मुर्दा मुरगी, मझली के बचत आदी या खरेलू अपशिष्ट) डालकर ऊपर फिरसे गोबर या गाढा स्लरी 6 इंच तक भरना। 75 डिग्री सेलषियस की ताप के कारण रोगाणू वगैरह खतम हो जायेगा। इस से किसी तरह की दुर्गन्त पैदा नहीं होता। भरनेतक ऐसे करते रहना। 90 दिनों में वह सूखा चूरा बनकर संभाल सकते हैं।

    आभारी – डो. फ्रानसिस सेव्यर

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  • हिन्दी में प्रसारित करने की कोशिश करूँगा।

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  • एक व्यक्ती या परिवार को अपने अधीन पर रखनेवाला जमीन के विस्तृती के नियम 1970 में केरल में लागू करने के विषय, जो किसान के च्छोटे हिस्सा भूमि अधिग्रहण जरिये सरकारी कार्वाई के विषय, कृषि उत्पादन के भव गिराने के विषय, उर्वरक कीटनाशक घास को खतम करनेवाले रौण्टप वगैरह के विषय, गांव कार्यालय में कर भरते विषय, मदद पाकर आयात निर्यात के विषय जैसे बातों पर किसान को पीडित होना पढते हैं। ट्रेड – यूनियन चलाने वाले सर्कारी कर्मचारियों के नेतृत्व में ही होताहैं। ऐसे संखटन सर्कारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई क्ररवाई आजतक नहीं ली। 25 साल में सर्कारी कर्मचारियों के धनका 20 गुणा बडा और पुरुष श्रम केलिये भी उतना ही बडा। उसके कारण दैनिक आवश्यक वस्तुओं की कीमत के बडना हैं। लेकिन ऐसे बडोत्री आवश्यक वस्तुओं की हुआ ही नहीं। केरल के रहने वालों को आवश्यक वस्तू चावल हैं। वही चावल एक या दो रुपये प्रति किलो मिलता हैं तो कर्मचारियों के धनका कटना चाहिये।
    उत्तर प्रदेश में किसान भूख के कारण बीबी को बेचने की समाचार हम समाचार पत्रों में पढा। वही राज्य में कियान के जमीन भूमी अधिग्रहण जरीये कबजे करके किसी पैसेवाले व्यक्ती को ऊँचे दाम में दी और उसके खिलाफ आवाज उठानेवाले कियानों को मार डालने की समाचार भी पढा। क्या आप को कुच्छ भी मेहसूस नहीं होता?
    मुंबई में गरीबों के छोपडियों भूमी अधिग्रहण के जरीये जो कबजा करने का कोशिश और उसके खिलाफ के आवाज भी हम ने सुना।
    अन्ना हसारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल केलिये लडते हैं वह जो हैं ऊँचे मछलियों को काबू में ला सकते हैं। लेकिन आम जनता को लूटनेवालों को कोन हतकडी लगायेगा? विज्ञापन प्रसारित करनेवाले व्यवसाय,कॉर्पोरेट, भ्रष्टाचारी पार्टी के प्रवरतकों वगैरह को संभालने केलिये यहाँ कई माध्यम मौजूद हैं। ब्लोग और सामाजिक नेटवर्क धोडा कुच्छ परिवर्तन ला सकते हैं। लेकिन वहाँ भी भ्रष्टार करने वालों के चमचे मौजूद होगा। नकली प्रोफ़ाइल बनाकर ङम संघडित शक्ती बोलकर व्यक्तियों को तकलीफ दागा। प्रजातंत्र के नाम से करनेवाला भ्रष्टाचार और गुण्टागर्दी रोकनेमें पुलीस या न्यायालय भी पराजित होता हैं। 

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  • अन्ना हजारे के आंदोलन ने अचानक युवाओं को जिस तेजी से अपनी ओर खींचा, उससे राजनीतिक दिग्गज भी हैरान रह गए। आज हमारा युवा खुद से बहुत ज्यादा उम्मीद रखता है। वह काफी कुछ पाना चाहता है। कई बार उसे पता नहीं होता कि सही रास्ते कौन-से हैं। यह बताने वाला सही रोल मॉडल भी युवा के पास नहीं है।

     

    अन्ना हजारे के आंदोलन ने युवाओं को आकर्षित किया तो कुछ खास वजहें थीं। अन्ना ने सीधी-साफ और दोटूक चीज की मांग की – जन लोकपाल बिल। उनकी भूख हड़ताल एक रियलिटी ड्रामे की तरह थी। ड्रामा लोगों को खींच रहा था। तीसरी बात यह कि कुछ ऐसी हस्तियां उनके साथ थीं जिनका अपना संगठन है और जिन्हें युवा आइडल मानता हैजैसे किरण बेदी, श्रीश्री रविशंकर, बाबा रामदेव। अन्ना ने सीधे-सीधे अच्छाई और बुराई के बीच लकीर खींच दी। बिना किसी डर या दुर्भावना के उन्होंने इस लकीर की दूसरी तरफ खड़े नेताओं की ओर इशारा किया।

    इसने भी आग में घी का काम किया। सबसे अहम बात यह कि भ्रष्टाचार से पूरा देश त्रस्त है, जिससे युवा देश के अन्य लोगों की तरह आंदोलन की तरफ खिंचा चला आया। खुद अन्ना के सीधे-सादे और ईमानदार व्यक्तित्व का भी इसमें योगदान था। वह सत्ताधारियों के साथ नहीं खड़े थे। राजनीतिज्ञों को खदेड़े जाने ने भी बिजली सरीखा असर किया। इससे युवा में यह संदेश गया कि यह बंदा जनता के लिए काम करेगा। इसका निजी कोई स्वार्थ नहीं। कॉमनवेल्थ खेल के वक्त से ही घोटालों का जो सिलसिला शुरू हुआ, तभी से सभी के अंदर एक क्रोध था कि तुमने देश का नाम खराब क्यों किया। घोटालों से राष्ट्रीय स्वाभिमान आहत था। उसका भी प्रभाव दिखा।

    आक्रोश था जो प्रेशरकुकर की तरह अन्ना की सीटी बजने के साथ बाहर आ गया। सरकार हफ्ते की देरी करती तो यह बड़ा रूप ले सकता था और खतरनाक हो सकता था। अहम बात यह है कि बीस-पच्चीस साल पहले जन्मे युवा ने इस आंदोलन के जरिये राजनीति का पहला स्वाद चखा है। उसने कम से कम अपनी ताकत को पहचाना है। जरूरत इस बात की है कि वह इस ताकत का सही इस्तेमाल भी जाने।

    लोगों को बदलाव चाहिए। खास तौर पर युवाओं को तुरंत बदलाव चाहिए। बदलाव शांति से नहीं आता तो युवाओं का क्रोध हिंसा में बदल जाता है। आंदोलन से युवाओं की सोच में जबरदस्त बदलाव आया है। आज छोटे-छोटे बच्चे अन्ना हजारे को गांधी के रूप में देखते हैं। अन्ना बापू की तरह अड़ियल भी है, नर्म भी, निडर भी।

    जन लोकपाल बिल भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अहम बिल है। कई देशों में ऐसी ही निष्पक्ष और ताकतवर संस्था भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सत्ताधीशों की जांच करती है। हांगकांग का उदाहरण सामने है। आजादी का मतलब यह नहीं कि यह सत्ताधीशों की आजादी है। एक बार चुने गए तो आप खुद ही पुलिस स्टेशन हैं और खुद ही कानून हैं। आजादी का यह मतलब नहीं कि सत्ताधारियों पर अंकुश के कानून न बनाए जाएं।

    इस आंदोलन से अगर युवाओं और लोगों ने पॉवर का स्वाद चखा है, तो नेताओं ने पॉवर की सीमा का स्वाद चखा है। अगर प्रभावी लोकपाल के गठन में गतिरोध आता है, तो युवा तभी फिर अन्ना के आंदोलन में उतरेंगे जब अन्ना यह बताने में सफल रहें कि क्या गलत हुआ है और कौन लोग असरदार लोकपाल नहीं बनने दे रहे हैं। तब निश्चय ही लोग फिर जुड़ेंगे। हालांकि यह ठीक इसी स्तर पर और इतना ही स्वत:स्फूर्त शायद न हो।

    एक बार जो हो जाता है, वह वैसा ही दोबारा घटित नहीं होता। अगले आंदोलन की शक्ल अलग होगी। वैसे सरकार अब ऐसा कुछ नहीं करेगी कि अन्ना को फिर अनशन जैसा निर्णय लेना पड़े, क्यों कि नेताओं में डर पैदा हो गया है कि अगर वे भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़े दिखाई दिए तो उनके नीचे से समर्थन खिसक जाएगा। प्रभावी लोकपाल जनता का हक है, अब जनता को बहलाया-फुसलाया नहीं जा सकता, यह नेता समझ चुके हैं।

    इस आंदोलन को राजनीतिज्ञों के ऊपर अंकुश की तरह काम करना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि इसका स्वरूप और शक्ति ऐसी है कि यह एक और राजनीतिक पार्टी बन जाए। यह पार्टियों पर दबाव बनाए रखने का रचनात्मक काम कर सकता है। यदि अच्छा लोकपाल हो और कई भ्रष्ट नेता जेल जाएं, तो भ्रष्टाचार के खत्म होने की संभावना अभी बनी हुई है। यदि हर साल हर पार्टी अपने यहां से दस प्रतिशत सबसे भ्रष्ट नेताओं को निकालती जाए और दस प्रतिशत सही उम्मीदवार चुने, तो संभव है कि अगले दस सालों में पार्टियों का नया रंगरूप हो।

    इसके लिए कई अन्य चीजें करने की जरूरत है। मिसाल के लिए, चुनावों के दौरान लीगल एलेकशन फंडिंग का एक तरीका हो, जिससे चुनाव में काले-सफेद धन को लेकर पारदर्शिता आए। जमीनी राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए भी वाजिब सेलेरी या पारिश्रमिक हो, ताकि वह दूसरे गलत फायदों के लिए पार्टियों के साथ न जाए। इन सब चीजों के लिए वातावरण और दबाव बनाने का काम यह आंदोलन करे, न कि खुद एक राजनीतिक पार्टी बने। (जैसा प्रणति तिवारी से कहा)
    Courtesy: युवाओं में नई जागरूकता
    केरल में भी हम युवाओं के इकटा करके चर्चा जारी रखें और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास करूँगा।कॊल्लम में श्री एस. बलराम ने कहा था कि ह्यूमण रैट आक्ट (Human Right Act) के हेडिंग बदलकर चैलड रैट आक्ट बना दिया हैं। क्या अन्याय है यह?

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